Guru Purnima Kyu Manai Jaati Hai ?|गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है ? | Why Guru Purnima is Celebrated in Hindi ?

आपका स्वागत है, गुरु के बिना न तो जीवन की सार्थकता है और ना ही ज्ञान प्राप्ति संभव है। जिस प्रकार जिस तरह हमारी प्रथम गुरु मां हमें जीवन देती है और सांसारिक मूल्यों से हमारा परिचय कराती है ठीक उसी तरह ज्ञान और भगवान की प्राप्ति का मार्ग केवल एक ही गुरु दिखा सकता है यानी कि गुरु के बिना कुछ भी संभव नहीं है शायद यही वजह रही होगी कि गुरु पूजा की शुरुआत की गई।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि आषाढ़ एक माह में ही Guru Purnima क्यों पड़ती है और आखिर किसने यह परंपरा शुरू की ?

इस दिन वेदव्यास के अनेक शीशों में से पांच शिष्यों ने गुरु पूजा की परंपरा प्रारंभ की थी पुष्प मंडप में उच्च आसन पर गुरु यानी व्यास जी को बैठा कर पुष्पमाला अर्पित की जिस कारण इस दिन हर साल लोग व्यास जी के चित्र का पूजन और और उनके द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन करते हैं। कई मठों और आश्रमों में संतों की मूर्ति व समाधि की पूजा करते हैं।

Guru Purnima खास तौर पर वर्षा ऋतु में मनाने के पीछे भी एक कारण है। क्योंकि इन 4 माह में ना अधिक गर्मी और ना अधिक सर्दी होती है यह समय अध्ययन और अध्यापन के लिए अनुकूल व सर्वश्रेष्ठ होता है। इसलिए गुरु चरण में उपस्थित शिष्य ज्ञान शांति, भक्ति और योग शक्ति को प्राप्त करने हेतु समय का चयन करते हैं। वैसे तो हर दिन गुरु की सेवा करनी चाहिए लेकिन इस दिन हर शिष्य को अपने गुरु की पूजा कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहिए और इसी वजह से Guru Purnima का पर्व मनाया जाता है।

Guru Purnima की कहानी –

दोस्तों हमारे देश में गुरुओं का बहुत सम्मान किया जाता है क्योंकि एक गुरु ही है जो अपने शिष्य को गलत मार्ग से हटाकर सही रास्ते पर लाता है। पौराणिक काल से संबंधित ऐसी बहुत सी कथाएं सुनने को मिलती हैं जिससे यह पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति को महान बनाने में गुरु का विशेष योगदान रहा है। इस दिन को मनाने के पीछे का एक कारण यह भी माना जाता है कि इस दिन महान गुरु महर्षि वेदव्यास जिन्होंने वर्मा सूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और 18 पुराण जैसे अद्भुत साहित्य की रचना की उनका जन्म हुआ था।

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शास्त्रों में आषाढ़ी पूर्णिमा को वेदव्यास का जन्म माना जाता है इसलिए आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन Guru Purnima का पर्व मनाया जाता है। और इस साल Guru Purnima 13 जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन सब लोग अपने अपने गुरुओं का आशीर्वाद आज लेते हैं और उन्होंने अब तक जो कुछ भी दिया है उसके लिए धन्यवाद देते हैं। गुरु के बिना एक शिष्य का जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

रामायण से लेकर महाभारत तक गुरु का स्थान सबसे महत्वपूर्ण और सर्वोच्च रहा है। गुरु की महत्ता को देखते हुए महान संत कबीर दास जी ने लिखा है गुरु “गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय” यानी एक गुरु का स्थान भगवान से भी कई गुना ज्यादा बड़ा होता है। Guru Purnima का पर्व महर्षि वेदव्यास के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

वेदव्यास जो ऋषि पराशर के पुत्र थे शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास को तीनों कालों का ज्ञाता माना जाता है। महर्षि वेदव्यास के नाम के पीछे की एक कहानी है माना जाता है कि मैं महर्षि व्यास ने वेदो को अलग-अलग खंडों में बांटकर उनका नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थ वेद रखा।

वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए। महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास के नाम से तो शायद ही कोई अंजान हो। यह वही मुनी है जिन्होंने चारों वेदों का विभाव किया। 18 पुराणों की रचना की और श्रीमद्भागवत की रचना की। उन्हें गुरु शिष्य परंपरा का प्रथम गुरु माना जाता है। वे भलीभांति जानते थे कि यदि किसी व्यक्ति से कोई ज्ञान मिलता है, कुछ सीखने को मिलता है तो वह हमारे लिए गुरु समान हैं, पूजनीय हैं। चाहे वो छोटा सा जीव जंतु, कोई प्राणी या फिर मनुष्य ही क्यों ना हो।

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शास्त्रों में एक घटना का वर्णन आता है कि एक बार मुनव्वर ने हीन जाति के एक व्यक्ति को पेड़ को झुका कर उससे नारियल तोड़ते हुए देखा। उस दिन से व्यास जी उस व्यक्ति का पीछा करने लगे क्योंकि यह विद्या सीखने के इच्छुक थे। पर वह व्यक्ति संकोच और डर के कारण वेदव्यास जी से दूर भागता है। एक दिन पीछा करते-करते व्यास जी उस व्यक्ति के घर पहुंच गए जहां वह तो नहीं पर उसका पुत्र मिल गया जिसने व्यास जी की पूरी बात सुनी और वह मंत्र देने को तैयार हो गया। अगले दिन व्यास जी पधारे और पूरे नीति नियम के साथ उन्होंने वह मंत्र लिया।

पिता ने यह सब देखा तो उससे रहा नहीं गया और उसने पुत्र थे इसका कारण जानना चाह। पुत्र की बात सुनकर पिता ने कहा कि बेटा, मैं व्यास जी को यह मंत्र जानबूझकर नहीं देना चाहता था क्योंकि मेरे मन में यह बात थी कि जिस व्यक्ति से मंत्र लिया जाता है वह गुरु तुल्य हो जाता है और हम लोग तो गरीब छोटी जाति के हैं तो ऐसे में क्या व्यास जी हमारा सम्मान करेंगे। फिर पिता ने कहा कि बेटा यदि मंत्र देने वाले को पूज्य ना समझा जाए तो वह मंत्र फलित नहीं होता। इसलिए तुम जाओ और व्यास जी की परीक्षा लो वह तुम्हें सम्मान देंगे या नहीं।

पुत्र अगले ही दिन पहुंच गया व्यास जी के दरबार में जहां वह अपने साथियों से विचार विमर्श कर रहे थे।अपने गुरु को आते देखकर व्यास जी दौड़कर आए और उनका पातपूजन कर नीति नियम से उनका मान सम्मान किया। यह देखकर वह व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और तब उसकी और उसके पिता की सारी दुविधाएँ मिट गई। जो व्यक्ति एक छोटी जाति के व्यक्ति को भी गुरु तुल्य महत्व देता है वह वाकई में परम पूजनीय है और तभी से यह गुरु शिष्य परंपरा में व्यास जी को सबसे अग्रणी गुरु माना जाने लगा और वर्ष में 1 दिन परमा ज्ञानी सतगुरु को समर्पित किया गया जो व्यास पूर्णिमा या गुरु पूनम के नाम से प्रचलित है।

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Guru Purnima के दिन गुरुओं का पूजन किया जाता है, गुरु कि हमारे जीवन में महत्व को समझाने के लिए Guru Purnima का पर्व मनाया जाता है। Guru Purnima पर लोग अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं जिन लोगों के गुरु अब इस दुनिया में नहीं रहे वे लोग भी गुरु की चरण पादुका का पूजन करते हैं माना जाता है कि इस दिन गुरुओं का आशीर्वाद लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में गुरु को परम पूजनीय माना गया है।

तो दोस्तों उम्मीद करता हूं इस पोस्ट में Guru Purnima से जुड़ी सारी जानकारी दे दी होगी।

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